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Jay Amit Shah couldn’t be BJP Robert Wadra

ताकि जय अमित शाह बीजेपी के रॉबर्ट वाड्रा न बन जाएँ!

Jay Amit Shah couldn’t be BJP Robert Wadra

अगर जय अमित शाह के दिल में चोर होता तो वो ‘द वायर’ वेबसाइट पर आपराधिक मानहानि का मुक़दमा क्यों ठोकते?

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने अपने बेटे के बचाव में यही दलील तो दी है कि काँग्रेस पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे पर क्या कभी किसी काँग्रेसी नेता ने दावा करने की हिम्मत जुटाई?

जिस पत्रकार ने जय अमित शाह की कंपनी के खातों की छानबीन करके खबर लिखी उसी ने काँग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के बिज़नेस पर भी खोजी रिपोर्टें छापीं पर क्या वाड्रा ने मुक़दमा दायर किया?

अमित शाह की इस वज़नदार दलील को ख़ारिज करना मुश्किल है, मगर एक बात साफ़ है: इस ख़बर से जय अमित शाह के बिज़नेस और मान पर कोई असर पड़ा हो या न पड़ा हो भारतीय जनता पार्टी के लिए ये ख़बर बहुत बुरे वक़्त पर आई है.

Jay Amit Shah couldn't be BJP Robert Wadra

गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं. ख़ासतौर पर गुजरात में बीजेपी नहीं चाहती कि उसका पाँव किसी फिसलन पर पड़े और वो रपट जाए. क्योंकि ये रपटन फिर 2019 तक जारी रहेगी.

यही वजह है कि एक बिज़नेसमैन की ओर से सफ़ाई देने के लिए जनतांत्रिक तरीक़े से चुनी गई सरकार के एक ज़िम्मेदार मंत्री पीयूष गोयल को सामने किया गया और ख़बरों के मुताबिक़ ‘द वायर’ के ख़िलाफ़ जय अमित शाह की ओर से मानहानि का मुक़दमा लड़ने के लिए भारत सरकार के वकील की सेवाएँ ली जा रही हैं.

Jay Amit Shah couldn't be BJP Robert Wadra

भारतीय जनता पार्टी का पूरा तंत्र जय अमित शाह को बचाने में इसलिए नहीं लगा है वि वो वाक़ई उन्हें बचाना चाहता है.

पीयूष गोयल से लेकर तमाम नेता इस लड़ाई में इसलिए कूदे हैं क्योंकि वो नहीं चाहते कि जय अमित शाह भारतीय जनता पार्टी का रॉबर्ट वाड्रा बन जाए. या तेजस्वी यादव की तरह उनकी भी एक परजीवी जैसी छवि बन जाए और फिर गंगा-जमुना का पवित्र पानी भी अमित शाह पर लगे दाग़ को कभी छुटा न पाए.

 

राजनीतिक लड़ाई सत्य के आधार पर नहीं, बल्कि इस आधार पर लड़ी जाती है कि जनता किसे सत्य मानती है. इसलिए संगठित पार्टियाँ, उनके नेता और मीडिया मैनेजर अपने विरोधी को खलनायक या फिर जोकर सिद्ध करने की मशक्कत में जुटे रहते हैं.

इसके लिए एक विराट सत्य गढ़ा जाता है जिसमें दुश्मन भीषण रूप से अनैतिक, दुराचारी, भ्रष्टाचारी, लालची और व्याभिचारी खलनायक की तरह दिखाई दे और उसका सर्वनाश करने वाला जननायक जनता की नज़र में सर्वगुण संपन्न, उदार, जनता का दुलारा और विज़नरी बना रहे.

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इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद जब राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने तो उनकी ‘मिस्टर क्लीन’ वाली छवि गढ़ी गई.

उन्हें कंप्यूटर युग और संचार क्रांति की शुरुआत करने वाला विज़नरी कहा गया, हालाँकि तीन बरस के भीतर ही पुराने समाजवादी, बीजेपी वाले, कम्युनिस्टों का एक धड़ा, आरएसएस के संगठन एकजुट हो गए और ‘मिस्टर क्लीन’ देखते ही देखते एक चालबाज़, रिश्वतख़ोर, स्वार्थी और भ्रष्ट नेता नज़र आने लगे.

‘इंडिया टुडे’ पत्रिका ने तब अपनी एक कवर स्टोरी में तस्वीरों के ज़रिए बताया कि सौम्य दिखने वाले राजीव गाँधी किस तरह चार साल में परेशानहाल, घाघ, क्रुद्ध और शातिर दिखने लगे थे. तब सोशल मीडिया भी नहीं था.

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गुजरात के दंगों के बाद नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव प्रचार करने गईं सोनिया गाँधी ने जब ‘मौत के सौदागर’ जुमले का इस्तेमाल किया तो क्या वो नवंबर 1984 में दिल्ली की सड़कों पर सिखों को ज़िंदा जला रहे ‘मौत के सौदागरों’ को भूल गई होंगी? क्या उन्हें याद नहीं रहा होगा कि उनकी अपनी पार्टी के सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर, हरकिशनलाल भगत जैसे नेताओं को सिख किस नज़र से देखते रहे थे?

पर राजनीति इसी खेल का नाम है. तुम्हारा ‘मौत का सौदागर’ ख़तरनाक और मेरा ‘मौत के सौदागर’ परिस्थितियों का शिकार. तुम्हारा दंगा देश का नाश करता है, मेरा दंगा जन-भावनाओं का विस्फोट. मेरा जय अमित शाह मासूम, मगर तुम्हारा रॉबर्ट वाड्रा भ्रष्ट!

Jay Amit Shah couldn't be BJP Robert Wadra

 

सोशल मीडिया ने किसी की छवि गढ़ने या छवि को मटियामेट कर देने की ताक़त जब से हर मोबाइल फ़ोन लेकर चलने वाले को दे दी है, तभी से राजनीतिक पार्टियों ने सोशल मीडिया वॉरियर्स की फ़ौज भर्ती करना शुरू किया. इस मामले में भारतीय जनता पार्टी ने काँग्रेस को शुरुआती दौर में ही मात दे दी.

राहुल गाँधी की कोई छवि बन पाती इससे पहले ही उन्हें ‘पप्पू’ और ‘युवराज’ कहा जाने लगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने इस छवि को गढ़ा और उनके सोशल मीडिया वॉरियर्स ने इसका प्रचार प्रसार किया.

नरेंद्र मोदी ने तो लोकसभा तक में कह दिया कि कुछ लोगों की उम्र बढ़ती है पर मानसिक उम्र नहीं बढ़ पाती.

अमरीका में भाषण देते हुए मोदी ने रॉबर्ट वाड्रा को नाम लिए बिना निशाने पर लिया और कहा: नेताओं पर आरोप जल्दी लगते हैं – इसने पचास करोड़ बनाया, उसने सौ करोड़ बनाया, बेटे ने ढाईसौ करोड़ बनाया, बेटी ने पाँच सौ करोड़ बनाया… दामाद ने हज़ार करोड़ बनाया. वहाँ मौजूद मोदी पर मुग्ध हिंदुस्तानियों की भीड़ ने तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गुँजा दिया.

सोनिया गाँधी का ‘मौत के सौदागर’ वाला दाँव नहीं चल पाया, बल्कि उलटा पड़ गया. मगर नरेंद्र मोदी का ‘युवराज’ और ‘दामाद जी’ वाला दाँव चल पड़ा.

अब राहुल गाँधी लाख कोशिश करें कि लोग उनकी बातों को सुनें और गंभीरता से लें, पर सोशल मीडिया के किसी कोने में उनकी वीडियो क्लिप के साथ कोई जोकर का चेहरा चिपका देता है और उसे वायरल कर दिया जाता है.

इस खेल को बीजेपी बहुत अच्छी तरह से समझती है इसलिए नहीं चाहती कि जय अमित शाह बीजेपी के रॉबर्ट वाड्रा बना दिए जाएँ.

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