OPINION

Patna Sahib पटना साहिब और सिख धरम

पटना साहिब की सिक्ख विरासत

पटना साहिब एक ऐतिहासिक नगर है जिस का जिक्र हिंदू धर्म और सिक्ख धर्म के ग्रंथों के साथ-साथ भारत आने वाले यात्रियों की लिखितों में भी देखने को मिलता है। इतिहास में पाटलीपुत्र के नाम से प्रसिद्ध यह नगर गुरू गोबिन्द सिंघ जी की रचना दसम ग्रंथ में ‘पटना सहर’ के नाम से सिक्ख मानसिकता में परिपक्व हुआ है। मौजूदा समय में इस ऐतिहासिक नगरी को पटना साहिब की वजह से जाना जाता है।

भारत की यह पुरातन नगरी राजनीतिक और धार्मिक इतिहास में विशेष स्थान रखती है। अशोक, विक्रमादित्य आदि प्रसिद्ध राजाओं के साथ-साथ यह नगर जहाँ चाणक्य और पाण‍िनी की प्रतिभा का प्रगटावा करता है वहीं इस का सम्बन्ध जैन धर्म की महासभा के साथ भी जोड़ा जाता है। जैन धर्म की यह महासभा महावीर जी के 160 साल बाद पाटलीपुत्र (पटना) में हुई मानी जाती है जिस में जैन धर्म ग्रंथ से सम्बन्धित 11 आगमों को सही रूप में पेश किया गया था। इसी तरह बुद्ध धर्म की तीसरी महासभा भी इसी नगर में हुई मानी जाती है जिस में बुद्ध धर्म के त्रिपिटिक ग्रंथों का विस्तृत अध्ययन किया गया था।

गुरू नानक देव जी से इस नगर का सम्बन्ध सिक्ख धर्म के साथ जुड़ता है। गुरु जी की जन्मसाखियों से पता चलता है कि पूर्व की उदासी (प्रचार यात्रा) के समय गुरू जी इस नगर में आए थे। गुरू जी जीवन की अनमोलकता को पहचानने और इस को प्रभु के साथ जोड़ने की प्रेरणा देते थे। वह कहते थे कि जीवन एक अमूल्य रत्न की तरह है परन्तु विषय-विकारों में फंसा हुआ मानव इस की कद्र नहीं करता। गुरू जी ने यही उपदेश पटना के अमीर व्यापारी सालिसराय जौहरी को दिया था जिस से प्रभावित हो कर वह गुरू जी का श्रद्धालु हो गया था। अपने घर ले जा कर तीन महीने उस ने गुरू जी की सेवा की थी। सालिसराय का सेवक अधरका भी गुरू जी का श्रद्धालु बन कर उन की सेवा और परमात्मा का सिमरन करने लगा था। भाई बाले वाली जन्मसाखी बताती है कि गुरू नानक देव जी ने सालिसराय जौहरी को वहाँ का प्रचारक नियुक्त करते हुए कहा कि, ‘सुन सालस राय जिचर तू जीवे तब तक तेरी मंजी (सिक्ख धर्म का प्रचार स्थान) और जब तेरी देह छूटे तो अधरका बहे।’ सालिसराय जौहरी को गुर के शब्द का प्रचार करने की प्रेरणा दे कर गुरू जी आगे चले गए थे। गुरू जी के वहाँ से चले जाने के उपरांत अधरका और सालिसराय जौहरी का परिवार गुरू जी द्वारा दिखाऐ मार्ग पर चल कर लोगों की सेवा करता रहा। सालिसराय जौहरी का घर धर्मशाला का रूप धारण कर गया और पटना आने वाली संगत यहाँ निवास करने लगी थी जिस कारण पटना साहिब में सिक्खी का विकास होने लगा।

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गुरू नानक देव जी के बाद पटना साहिब में स्थापित हुई सिक्ख संगत गुरू घर के साथ जुड़ने लगी और गुरू अमरदास जी ने मंजी प्रथा के द्वारा इस को और ज्यादा संगठित रूप प्रदान किया था। गुरू हरगोबिंद साहिब जी का एक हुक्मनामा पटने की संगत के नाम है जिस में गुरू जी समूची संगत को अपना पुत्र बताते हुए गुरू-गुरू जपने, सतसंगत करने और तामसिक भोजन से दूर रहने की शिक्षा देते हैं। गुरू हरगोबिंद साहिब जी के समय पटना साहिब की संगत के प्रमुख सिक्खों का वर्णन भाई गुरदास जी करते हैं। सिक्खों की भगतमाला में इन गुरसिक्खों के गुरू दर्शनों को आने और अपनी शंकाओं की निवृति का जिक्र करते हुए बताया गया है कि जब भाई नवला और भाई निहाला ने गुरू जी से ऐसे कामों के बारे में पूछा जो दुनियादारी से मुक्त करते हैं तो गुरू जी ने उन को नाम जपने, संतों की सेवा करने और मन में नम्रता रखने की प्रेरणा दी थी।

गुरू तेग़ बहादुर जी पूर्व की यात्रा पर गए तो वह अपने परिवार को पटना साहिब में छोड़ कर आगे असम की यात्रा पर चले गए थे। पटने से आगे जाने का जिक्र गुरू तेग़ बहादुर जी के एक हुक्मनामे में भी आया है जिस में गुरू जी कहते हैं ‘संगत पटने की सूबे की गुरू रखेगा..। असीं परे राजे जी के साथ गए हां कबीला हमो पटने मो छोडा है।’ इस तरह पटने की संगत को पूर्व में सिक्खी का केंद्र मानते हुए गुरू जी पटने को ‘गुरू का घर’ कहते हैं। गुरू जी द्वारा पटना साहिब की संगत के लिए लिखे और हुक्मनामे भी मौजूद हैं जिन में से वहाँ के प्रमुख सिक्खों से सम्बन्धित जानकारी प्राप्त होती है। यह समूह सिक्ख गुरू आशय और उद्देश्य के अनुसार कार्य करने लगे जिस कारण आसपास के इलाकों में सिक्खी तेज़ी के साथ फैलती जा रही थी।

जब गुरू तेग़ बहादुर जी पटना साहिब पहुँचे तो गुरू नानक देव जी का सिक्ख बने भाई अधरका के परिवार में से घनश्याम और गुलाबराय उस इलाके के प्रचारक थे। सत्कार सहित वह गुरू जी और उनके परिवार को अपने साथ सालिसराय जौहरी की धर्मशाला में ले आए थे। यहाँ ही गुरू गोबिन्द सिंघ जी का प्रकाश हुआ था जिस का जिक्र करते हुए विचित्र नाटक में बताया गया है – तही प्रकास हमारा भयो। पटना सहर बिखै भव लयो।

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गुरू गोबिन्द सिंघ जी के इस नगर में प्रकाश होने के कारण सिक्खों में इस की मान्यता और महानता बहुत अधिक बढ़ गई थी। इस नगर में श्री गुरु गोबिन्द सिंघ जी का प्रकाश स्थान ‘तख़्त श्री हरिमन्दिर जी पटना साहिब’ के नाम से प्रसिद्ध है। गुरू गोबिन्द सिंघ जी के जीवन का आरंभिक समय इस नगर में व्यतीत हुआ था जिस से सम्बन्धित स्थान इस नगर में सुशोभित हैं। यह धार्मिक स्थान इस नगर में सिक्खों की धार्मिक विरासत की याद दिलाते हैं। इस नगर में श्री गुरु नानक देव जी, श्री गुरु तेग़ बहादुर जी और श्री गुरु गोबिन्द सिंघ जी की याद में गुरुद्वारा तख़्त श्री हरिमन्दिर साहिब; गुरुद्वारा बाल लीला, मैनी संगत; गुरुद्वारा श्री गुरु गोबिन्द सिंघ जी घाट (कंगन घाट); गुरुद्वारा हाँडी साहिब; गुरुद्वारा गुरू का बाग़; गुरुद्वारा गाय घाट; गुरुद्वारा संगत साहिब; गुरुद्वारा सुनार टोली आदि प्रसिद्ध हैं। गुरुद्वारों में संभाल कर रखी हुई गुरू साहिबान और उन के परिवार से सम्बन्धित निशानियाँ संगतों के आकर्षण का केंद्र हैं। सिक्खों की विरासत का अंग यह कीमती निशानियाँ पटना साहिब के साथ सिक्खों के सम्बन्धों को परिपक्वता प्रदान करती हैं।

गुरू गोबिन्द सिंघ जी के बाद इस नगर का सिक्खों से सम्बन्धित विस्तृत विवरण गुरू गोबिन्द सिंघ जी के महलों (पत्नियाँ), माता सुन्दरी जी और माता साहिब कौर जी द्वारा जारी किये हुक्मनामों में मिलता है। चाहे कि मूल रूप में यह हुक्मनामे पटना साहिब में संभाल कर रखे हुए हैं परन्तु इन से सम्बन्धित विवरण डॉ. गंडा सिंघ और दूसरे विद्वानों की लिखितों में देखा जा सकता है। इन हुक्मनामों में माता सुन्दरी जी पटने की सिक्ख संगत को ‘श्री अकाल पुरख जी का खालसा निवासी पटने का’ कह कर ‘गुरू गुरू जपना जन्म सवारना’ की शिक्षा देते हैं। इन हुक्मनामों से उस समय के प्रमुख सिक्खों के बारे में जानकारी भी प्राप्त होती है। जो भी सिक्ख को या जिस कार्य के लिए हुक्मनामा भेजा गया है, उस का स्पष्ट वर्णन मिलता है। गुरू महलों की तरफ से पटने की संगत को जारी किये जो हुक्मनामे मिलते हैं उन में तीन प्रमुख विशेषताएं सामने आती हैं। पहली, दसवंध की माया संगत को सीधे गुरू-घर भेजने का आदेश दिया गया है; दूसरी, धर्म को जीवन में प्रमुखता प्रदान करते हुए हर कार्य धर्म के अनुसार करने का आदेश दिया गया है। तीसरी, ‘गरीब का मुँह गुरू की गोलक’ जान कर गुरू-घर आने वाली दसवंध की माया ज़रूरतमंदों तक पहुँचाने के लिए प्रेरणा दी गई है। गुरू महलों द्वारा जारी किये गए हुक्मनामे पटना साहिब की संगत की समस्याओं का निवारण करने के साथ-साथ सिक्ख संगत को संगठित करने की तरफ केंद्रित करते हैं।

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सिक्ख इतिहास में पटना साहिब की विशेष महानता का वर्णन माता सुन्दरी जी के हुक्मनामे (आदेश) में भी मिलता है। माता जी ने भाई मनी सिंघ जी को हरिमन्दिर साहिब की सेवा-संभाल के लिए अमृतसर भेजा तो साथ ही यह आदेश भी कर दिया था कि पटना साहिब में भेजा जाने वाला चढ़ावा अमृतसर में ही रख लिया जाये। रत्न सिंघ भंगू बताता है – ‘आगे चढ़ावो पटने जावे। माता कहने ते ईहाँ आवे।’ इस आदेश से सिक्खों के मन में पटना साहिब के प्रति सत्कार और सेवा-भाव स्पष्ट होता है।

पटना साहिब में सुशोभित तख़्त श्री हरिमन्दिर जी पटना साहिब का इतिहास लगभग 350 साल पुराना है। कहा जाता है कि सिक्ख संगत ने 1665 ईस्वी में यह स्थान श्री गुरु तेग़ बहादुर जी के लिए तैयार करवाया था। इसी स्थान पर ही 1666 ईस्वी में श्री गुरु गोबिन्द सिंघ जी का प्रकाश हुआ था। उन्नीसवीं सदी में इस स्थान की नयी इमारत महाराजा रणजीत सिंघ ने तैयार करवाई थी। बीसवीं सदी के चौथे दशक दौरान आए भुकंप से इस इमारत का नुकसान होने के कारण इस का पुनर्निर्माण की आवश्यकता महसूस होने लगी थी। संगत ने सामूहिक रूप में कार सेवा के द्वारा एक आलीशान इमारत का निर्माण किया जहाँ पर वर्तमान समय में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश किया जाता है।

पटना साहब देश-विदेश के यात्रियों के आकर्षण का केंद्र है। गुरू गोबिन्द सिंघ जी के प्रकाश उत्सव से सम्बन्धित 350 साल संपूर्ण होने के कारण सिक्ख संगत में इस स्थान के प्रति पहले से ज्यादा आकर्षण पैदा हुआ है। सिक्ख विरासत का अंग होने के कारण पटना साहिब के साथ सिक्खों के जो भावनात्मक सम्बन्ध मौजूद हैं, शताब्दी समागम इन को और ज्यादा मजबूत कराने में सहायक सिद्ध होंगे।

डॉ. परमवीर सिंघ

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