OPINION

Problem of human being is choice चुनाव ही समसत दुखों की जङ है

मनुष्य सदैव चुनता है, ये ही मनुष्य का उलझाव है

ङा. नीलकमल


मनुष्य सदैव चुनता है।उसे कभी ये बोध नहीं होता कि वह चुनता है,ये ही मनुष्य का उलझाव है।
मनुष्य जब सुख चुनता है तो उसे ध्यान में ही नहीं आता कि उसने दुःख भी चुन लिया।
क्यों?
प्रक्रिया समझ लें।
किसी ने चाहा कि सुख मिले।इस चाह में कई बातें घट गईं।एक तो यह कि सुख मांगने वाला पहले से ही दुखी है।केवल दुखी ही सुख को चाहता है।सुखी सुख को क्यों चाहेगा?मांग उसी की होती है,जो पास में नहीं है।जो पास में है उस की मांग होने का प्रश्न ही नहीं है।दुःख को कोई नहीं मांगता,क्योंकि दुःख है सबके पास।सुख को सभी मांगते हैं,क्योंकि उनके पास नहीं है।

दुसरी बात,जो भी सुख मांगा जा रहा है,यदि वह न मिला तो दुःख और भी गहन हो जायेगा।मिलने की कोई गारंटी नहीं है। यदि सुख मिल भी गया,तो भी मनुष्य दुःख में उतर जायेगा;क्योंकि मिल जाने पर पता चलेगा कि सोचे थे कितने सपने इस सुख के मिलने से पूरे होंगे,वे कोई भी पूरे होंगे नहीं।

सारे सुख दूर से दिखाई पड़ते हैं,पास आते ही खो जाते हैं।जब तक नहीं मिलते,तब तक सुख,मिलते ही सुख दुःख में बदल जाता है
सुख होता है दूरी में,
सुख होता है आशा में,
सुख होता है प्रतीक्षा में।
जब आ जाता है,जैसे-2 पास आने लगता है,वैसे-2 तिरोहित होने लगता है। दुःख किसी वस्तु में नहीं, सुख किसी वस्तु में नहीं। जितनी ज्यादा दूरी,उतना ही सुख, जितनी ज्यादा निकटता उतना दुःख। जितना मनुष्य सुख मांगता है,पहले तो मिलेगा नहीं;क्योंकि मांगने मात्र से मिल नहीं जाता।नहीं मिलता तो विषाद घेर लेता है।मिल जाता है तो रिक्तता,विफलता घेर लेती है कि व्यर्थ गई मेहनत-दौड़े-धूपे,श्रम किया और जो मिला वह ये है। जो चुनेगा,वह संसार में उलझ जायेगा।

संसार है चुनाव,मोक्ष है अचुनाव।
जो इस जगत से कोई मांग नहीं रखता,वह इस जगत से मुक्त हो जाता है। मनुष्य के मन में निरंतर ये प्रश्न उठता रहा है-सदियों से,सनातन से-कि जिस संसार में हम उलझे हैं, जिस संसार में दुःख,पीड़ा और संताप से घिर गए हैं,
उससे मुक्ति कैसे हो? यह संसार जिसमे दुःख,पीड़ा और संताप से घिर गए हैं;वस्तुतः क्या है? ये अंधकार जिसमे हम डूब गए हैं और खो गए हैं,इसका स्वरूप क्या है? क्योंकि स्वरूप को जान लेने के पश्चात ही इससे छूटने का उपाय हो सकता है।जिससे छूटना हो,उसे ठीक से जान लेना पड़ेगा।अज्ञान में ही बंधन निर्मित होते हैं।यदि बंधनों को खोलना हो तो ज्ञान से ही गांठ खुल सकती है।

ऐसा हुआ एक दिन भगवान बुद्ध सुबह जब भिक्षुओं के बीच आये तो उन्होंने हाथ में एक रुमाल लिया हुआ था।उन्होंने भिक्षुओं के सामने एक-2 करके रुमाल पर पांच गांठे बांधी और भिक्षुओं से पूछा कि जो रुमाल मैं लेकर आया था उसमें-और जब गांठे लगा दी हैं-उससे;ये रुमाल बदल गया या वही है? निश्चित ही कठिनाई थी।क्योंकि यह कहना भी गलत होता कि रुमाल बदल गया है,रुमाल तो वही का वही है;गांठे लगा देने मात्र से रुमाल के स्वभाव में कोई अंतर नहीं आया है।जितना था,जैसा था,वैसा ही रुमाल अब भी है।ये भी नहीं कहा जा सकता कि रुमाल नहीं बदला है,क्योंकि अब गांठो से घिरा है;इतनी बदलाहट हुयी जरूर है। तब एक भिक्षु ने उत्तर दिया कि ये रुमाल लगभग बदल गया है। इसे समझ लेना आवश्यक है-लगभग बदल गया है। बदला भी नहीं है। बदल भी गया है। बदला नहीं है,यदि इसके स्वरूप को देखें। बदल गया है,यदि इसके शरीर को देखें। नहीं बदला है,यदि इसकी आत्मा को समझें। बदल गया है,यदि इसकी देह को देखें।
नहीं बदला है भीतर से,लेकिन बाहर से गाँठ लग गई है और बदलाहट हो गई है।आकार बदल गया है,आकृति बदल गई है। नहीं बदला है,यदि इसके परम् स्वभाव को समझें। बदल गया है,यदि इसके व्यवहार को देखें।
क्योंकि जो रुमाल खुला था,वो उपयोग में आ सकता था। जब गांठे लग गई,वह उपयोग में नही आ सकता। रुमाल का उपयोग है,उसमे कुछ बांधा जा सकता है। लेकिन जो रुमाल खुद ही बंधा हुआ है,उसमे अब कुछ नहीं बांधा जा सकता। ‘समस्त भेद और समस्त विकल्पों का मूल चित्त है।यदि चित्त न हो तो कोई भेद नहीं,इसलिए परमात्मा में तू चित्त को एकाग्र कर दे।’

चित्त और एकाग्रता,इन दोनो के सम्बन्ध में गहराई से समझ लेना जरूरी है।चित्त जीवन में अनिवार्य है।चित्त का अर्थ है विचारों का प्रवाह।इसीलिये चित्त प्रतिपल बदल रहा है।एक क्षण भी वह नहीं है,जो क्षण भर पहले था।एक ही चित्त को दोबारा नहीं पाया जा सकता,पूरे समय भीतर धारा बह रही है,इस बहती धारा के पीछे खड़े होकर चेतना जगत को देख रही है।प्रत्येक वस्तु की छाया चित्त पर पड़ती है,और बदलता हुआ चित्त;खंड-2 टुकड़ों में बंटा हुआ चित्त,सारे जगत को भी तोड़ देता है। इसीलिये चित्त के द्वारा उसे नहीं जाना जा सकता जो कभी बदलता नहीं।बदलते हुए माध्यम से जो भी जाना जायेगा वह भी बदलता हुआ दिखाई देगा।क्योंकि जिस माध्यम से मनुष्य देखता है,वह आरोपित हो जाता है।

मन प्रतिपल बदल रहा है।इसलिए मन से मनुष्य केवल उसे ही जान सकता है,जो बदल रहा है। और इस जीवन के जो परम् सत्य हैं,वह अपरिवर्तनीय हैं;शाश्वत हैं,चित्त उन्हें जानने का माध्यम नहीं है। जगत की पदार्थ सत्ता मन की तरह ही प्रतिपल बदल जाती है,इसलिए मन से जगत की पदार्थ सत्ता को जाना जा सकता है;जगत में छिपे परमात्मा को नहीं जाना जा सकता है।

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